पर्यावरण विशेष:कागजों में सिमटी नन्हीं गौरैया

 

कुमुद रंजन सिंह की रिपोर्ट

 

 

“चुन चुन करती आयी चिड़िया, दाल का दाना लायी चिड़िया..” रफ़ी की आवाज़ में गायी गीत आज भी बचपन की याद दिला देती है। गीतकार शैलेन्द्र द्वारा रचित इस गीत का केंद्र बिंदु नन्ही चिड़िया है,जिसमें पक्षी और वन्यजीव के प्रति लोगों को एक अच्छा सन्देश दिया है। लेकिन अब ये गौरैया है कहाँ? जो पहले हमारी संस्कृति का हिस्सा हुआ करती थी।

 

 

सरकारी स्तर पर किए गए प्रयास

 

 

देश में तेजी से घटती आबादी को लेकर महज़ दो राज्यों के सरकार ने इसे राजकीय पक्षी घोषित किया है। वर्ष 2012 में दिल्ली सरकार और ठीक इसके अगले वर्ष 2013 में बिहार सरकार राजकीय पक्षी घोषित किया। इस घोषणा से पक्षीप्रेमियों खासकर गौरैया प्रेमी में एक ख़ुशी की लहर दौड़ गई।

 

 

रेड लिस्ट में शामिल है गौरैया

 

 

विश्व स्तर पर भी गौरैये की संख्या में भारी कमी होती जा रही है। ब्रिटेन की रॉयल सोसाइटी ऑफ प्रोटेक्शन ऑफ़ बर्ड ने अपने देश चिंता जाहिर करते हुए इसे रेड लिस्ट में शामिल किया है। वही भारत में आंध्रा यूनिवर्सिटी के एक शोध में इसकी आबादी में 60 फ़ीसदी से अधिक की कमी पायी है। वर्तमान में देश के कई शहरों में 80 फ़ीसदी से अधिक की कमी तो कहीं यह वर्षों से नजऱ ही नहीं आती है। यानि इनका अस्तित्व अब ख़त्म हो चूका है।

 

 

कागजों में दबकर रह गई गौरैया

 

 

बिहार एक गांव और कृषि प्रधान राज्य है। इसलिए एक समय में गौरैये के विकास के लिए पूर्ण विकसित प्राकृतिक वातारण मौजूद था। घर के आंगन,मुंडेर से लेकर किसान के खेत-खलिहान तक इसकी इसकी चहचहाहट गूंजती रहती थी। बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा 2013 में घोषणा के बाद वर्ष 2015 में वन विभाग को यह आदेश दिया गया था कि राज्य के सभी सरकारी कार्यालयों व आवासों में लकड़ी कृत्रिम घोषला लगाया जाए। जिसकी शुरुआत में पटना में 10 हज़ार घोषले लगाए जाने थे,फिर अन्य जिलों में लागू किया जाना था। लेकिन करीब 5 साल बीतने पर भी यह कहीं धरातल पर दिखाई नहीं देता है। इससे सरकार और प्रशासन की इच्छाशक्ति की कमी हो दर्शाता है।

 

 

क्यों गायब हो गई गौरैया

 

 

1.अधिक पैदावार के लिए खेतों में रसायनों का प्रयोग
2.कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल
3.मोबाइल टॉवरों से निकलता रेडिएशन
4.आधुनिक मकानों का निर्माण प्रणाली
5.विकास के नाम पर बेतहासा पेड़ों की कटाई
6.भोजन की कमी
7.गर्मियों में पानी की क़िल्लत
8.लोगों द्वारा शिकार किया जाना
9.आमलोगों की इसके प्रति उदासीनता का भाव
10.सरकार व प्रशासन में इच्छाशक्ति की घोर कमी

 

कैसे बचेगी हमारी गौरैया

 

1.खेतों में जैविक खाद का हो प्रयोग
2.कीटनाशक का कम से कम इस्तेमाल
3.दाना-पानी का हो समुचित व्यवस्था
4.गृह निर्माण के समय इसके लिए स्थान छोड़ें
5.चिन्हित कर कृत्रिम घोषले लगाए जायें
6.मोबाइल टॉवरों के रेडिएशन कम किए जायें
7.वृक्षारोपण में शमी का पेड़ लगाने की ही प्राथमिकता

 

 

 

क्या कहते है लोग

 

 

 

“बिहार की जलवायु पक्षियों के विकास के लिए अनुकूल है। विकास के नाम पर इसे बर्बाद न किया जाए” -वन्यजीव शोधकर्ता..राहुल कुमार,नूरसराय नालंदा

 

 

 

“पिछले 10 वर्षों से गौरैये के लिए काम कर रहा हूँ। लोगो को जागरूक और सरकरकारी स्तर पर भी इस खतरे को गंभीरता से लेने की जरूरत है।”राजीव रंजन पाण्डेय,गौरैया संरक्षण अभियान के संचालनकर्ता, नालंदा

 

 

“आईयूसीएन ने गौरैये को रेड लिस्ट में रखा है। इसे अस्तित्व में लाने के लिए आम और ख़ास लोगों को आगे आने की जरूरत है” –राकेश कुमार,सोसाइटी फॉर इंवायरमेंट एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट के चेयरमैन,नालंदा

 

 

“गौरैया हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है। अभी यह विलुप्ति के कगार पर है। जमीनी स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन इसमें तेजी लाने की जरूरत है”ओम प्रकाश पांचाल,सीहोर,मध्य प्रदेश

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